मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी
आज हम बात करेंगे ग़ालिब की शायरी की ग़ालिब का नाम शायद ही ऐसा कोई हो
जिसने नहीं सुना हो उर्दू शायरी में उनका योगदान हमेशा याद किया जायगा.
ये हैं ग़ालिब की कुछ लोकप्रिय ग़ज़लें और शेर....
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
हज़ारों ख़्वाहिशें
ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मिरे
अरमान लेकिन फिर भी कम निकले
डरे क्यूँ मेरा
क़ातिल क्या रहेगा उस की गर्दन पर
वो ख़ूँ जो चश्म-ए-तर
से उम्र भर यूँ दम-ब-दम निकले
निकलना ख़ुल्द
से आदम का सुनते आए हैं लेकिन
बहुत बे-आबरू
हो कर तिरे कूचे से हम निकले
भरम खुल जाए ज़ालिम
तेरे क़ामत की दराज़ी का
अगर इस तुर्रा-ए-पुर-पेच-ओ-ख़म
का पेच-ओ-ख़म निकले
मगर लिखवाए कोई
उस को ख़त तो हम से लिखवाए
हुई सुब्ह और
घर से कान पर रख कर क़लम निकले
हुई इस दौर में
मंसूब मुझ से बादा-आशामी
फिर आया वो ज़माना
जो जहाँ में जाम-ए-जम निकले
हुई जिन से तवक़्क़ो' ख़स्तगी की दाद पाने की
वो हम से भी ज़ियादा
ख़स्ता-ए-तेग़-ए-सितम निकले
मोहब्बत में नहीं
है फ़र्क़ जीने और मरने का
उसी को देख कर
जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले
कहाँ मय-ख़ाने
का दरवाज़ा 'ग़ालिब' और कहाँ वाइ'ज़
पर इतना जानते
हैं कल वो जाता था कि हम निकले
इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना
इशरत-ए-क़तरा
है दरिया में फ़ना हो जाना
दर्द का हद से
गुज़रना है दवा हो जाना
तुझ से क़िस्मत
में मिरी सूरत-ए-क़ुफ़्ल-ए-अबजद
था लिखा बात के
बनते ही जुदा हो जाना
दिल हुआ कशमकश-ए-चारा-ए-ज़हमत
में तमाम
मिट गया घिसने
में इस उक़दे का वा हो जाना
अब जफ़ा से भी
हैं महरूम हम अल्लाह अल्लाह
इस क़दर दुश्मन-ए-अरबाब-ए-वफ़ा
हो जाना
ज़ोफ़ से गिर्या
मुबद्दल ब-दम-ए-सर्द हुआ
बावर आया हमें
पानी का हवा हो जाना
दिल से मिटना
तिरी अंगुश्त-ए-हिनाई का ख़याल
हो गया गोश्त
से नाख़ुन का जुदा हो जाना
है मुझे अब्र-ए-बहारी
का बरस कर खुलना
रोते रोते ग़म-ए-फ़ुर्क़त
में फ़ना हो जाना
गर नहीं निकहत-ए-गुल
को तिरे कूचे की हवस
क्यूँ है गर्द-ए-रह-ए-जौलान-ए-सबा
हो जाना
बख़्शे है जल्वा-ए-गुल
ज़ौक़-ए-तमाशा 'ग़ालिब'
चश्म को चाहिए
हर रंग में वा हो जाना
ता कि तुझ पर
खुले एजाज़-ए-हवा-ए-सैक़ल
देख बरसात में
सब्ज़ आइने का हो जाना
इश्क़ मुझ को नहीं वहशत ही सही
इश्क़ मुझ को
नहीं वहशत ही सही
मेरी वहशत तिरी
शोहरत ही सही
क़त्अ कीजे न
तअल्लुक़ हम से
कुछ नहीं है तो
अदावत ही सही
मेरे होने में
है क्या रुस्वाई
ऐ वो मज्लिस नहीं
ख़ल्वत ही सही
हम भी दुश्मन
तो नहीं हैं अपने
ग़ैर को तुझ से
मोहब्बत ही सही
अपनी हस्ती ही
से हो जो कुछ हो
आगही गर नहीं
ग़फ़लत ही सही
उम्र हर-चंद कि
है बर्क़-ए-ख़िराम
दिल के ख़ूँ करने
की फ़ुर्सत ही सही
हम कोई तर्क-ए-वफ़ा
करते हैं
न सही इश्क़ मुसीबत
ही सही
कुछ तो दे ऐ फ़लक-ए-ना-इंसाफ़
आह ओ फ़रियाद
की रुख़्सत ही सही
हम भी तस्लीम
की ख़ू डालेंगे
बे-नियाज़ी तिरी
आदत ही सही
यार से छेड़ चली
जाए 'असद'
गर नहीं वस्ल
तो हसरत ही सही
दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ
दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा
न हुआ
मैं न अच्छा हुआ
बुरा न हुआ
जम्अ' करते हो क्यूँ रक़ीबों को
इक तमाशा हुआ
गिला न हुआ
हम कहाँ क़िस्मत
आज़माने जाएँ
तू ही जब ख़ंजर-आज़मा
न हुआ
कितने शीरीं हैं
तेरे लब कि रक़ीब
गालियाँ खा के
बे-मज़ा न हुआ
है ख़बर गर्म
उन के आने की
आज ही घर में
बोरिया न हुआ
क्या वो नमरूद
की ख़ुदाई थी
बंदगी में मिरा
भला न हुआ
जान दी दी हुई
उसी की थी
हक़ तो यूँ है
कि हक़ अदा न हुआ
ज़ख़्म गर दब
गया लहू न थमा
काम गर रुक गया
रवा न हुआ
रहज़नी है कि
दिल-सितानी है
ले के दिल दिल-सिताँ
रवाना हुआ
कुछ तो पढ़िए
कि लोग कहते हैं
आज 'ग़ालिब' ग़ज़ल-सरा न हुआ
हम रहें यूँ तिश्ना-लब पैग़ाम के
ग़ैर लें महफ़िल
में बोसे जाम के
हम रहें यूँ तिश्ना-लब
पैग़ाम के
ख़स्तगी का तुम
से क्या शिकवा कि ये
हथकण्डे हैं चर्ख़-ए-नीली-फ़ाम
के
ख़त लिखेंगे गरचे
मतलब कुछ न हो
हम तो आशिक़ हैं
तुम्हारे नाम के
रात पी ज़मज़म
पे मय और सुब्ह-दम
धोए धब्बे जामा-ए-एहराम
के
दिल को आँखों
ने फँसाया क्या मगर
ये भी हल्क़े
हैं तुम्हारे दाम के
शाह के है ग़ुस्ल-ए-सेह्हत
की ख़बर
देखिए कब दिन
फिरें हम्माम के
इश्क़ ने 'ग़ालिब' निकम्मा कर दिया
वर्ना हम भी आदमी
थे काम के
मैं गया वक़्त नहीं हूँ कि फिर आ भी न सकूँ
मेहरबाँ हो के
बुला लो मुझे चाहो जिस वक़्त
मैं गया वक़्त
नहीं हूँ कि फिर आ भी न सकूँ
ज़ोफ़ में ताना-ए-अग़्यार
का शिकवा क्या है
बात कुछ सर तो
नहीं है कि उठा भी न सकूँ
ज़हर मिलता ही
नहीं मुझ को सितमगर वर्ना
क्या क़सम है
तिरे मिलने की कि खा भी न सकूँ
ये जुनून-ए-इश्क़ के अंदाज़ छुट जावेंगे क्या
दोस्त ग़म-ख़्वारी
में मेरी सई फ़रमावेंगे क्या
ज़ख़्म के भरते
तलक नाख़ुन न बढ़ जावेंगे क्या
बे-नियाज़ी हद
से गुज़री बंदा-परवर कब तलक
हम कहेंगे हाल-ए-दिल
और आप फ़रमावेंगे क्या
हज़रत-ए-नासेह
गर आवें दीदा ओ दिल फ़र्श-ए-राह
कोई मुझ को ये
तो समझा दो कि समझावेंगे क्या
आज वाँ तेग़ ओ
कफ़न बाँधे हुए जाता हूँ मैं
उज़्र मेरे क़त्ल
करने में वो अब लावेंगे क्या
गर किया नासेह
ने हम को क़ैद अच्छा यूँ सही
ये जुनून-ए-इश्क़
के अंदाज़ छुट जावेंगे क्या
ख़ाना-ज़ाद-ए-ज़ुल्फ़
हैं ज़ंजीर से भागेंगे क्यूँ
हैं गिरफ़्तार-ए-वफ़ा
ज़िंदाँ से घबरावेंगे क्या
है अब इस मामूरे
में क़हत-ए-ग़म-ए-उल्फ़त 'असद'
हम ने ये माना
कि दिल्ली में रहें खावेंगे क्या
या-रब वो न समझे हैं न समझेंगे मिरी बात
है बस-कि हर इक
उन के इशारे में निशाँ और
करते हैं मोहब्बत
तो गुज़रता है गुमाँ और
या-रब वो न समझे
हैं न समझेंगे मिरी बात
दे और दिल उन
को जो न दे मुझ को ज़बाँ और
अबरू से है क्या
उस निगह-ए-नाज़ को पैवंद
है तीर मुक़र्रर
मगर इस की है कमाँ और
तुम शहर में हो
तो हमें क्या ग़म जब उठेंगे
ले आएँगे बाज़ार
से जा कर दिल ओ जाँ और
हर चंद सुबुक-दस्त
हुए बुत-शिकनी में
हम हैं तो अभी
राह में है संग-ए-गिराँ और
है ख़ून-ए-जिगर
जोश में दिल खोल के रोता
होते जो कई दीदा-ए-ख़ूँनाबा-फ़िशाँ
और
मरता हूँ इस आवाज़
पे हर चंद सर उड़ जाए
जल्लाद को लेकिन
वो कहे जाएँ कि हाँ और
लोगों को है ख़ुर्शीद-ए-जहाँ-ताब
का धोका
हर रोज़ दिखाता
हूँ मैं इक दाग़-ए-निहाँ और
लेता न अगर दिल
तुम्हें देता कोई दम चैन
करता जो न मरता
कोई दिन आह-ओ-फ़ुग़ाँ और
पाते नहीं जब
राह तो चढ़ जाते हैं नाले
रुकती है मिरी
तब्अ' तो होती है रवाँ और
हैं और भी दुनिया
में सुख़न-वर बहुत अच्छे
कहते हैं कि 'ग़ालिब' का है अंदाज़-ए-बयाँ और
कब से हूँ क्या बताऊँ जहान-ए-ख़राब में
मिलती है ख़ू-ए-यार
से नार इल्तिहाब में
काफ़िर हूँ गर
न मिलती हो राहत अज़ाब में
कब से हूँ क्या
बताऊँ जहान-ए-ख़राब में
शब-हा-ए-हिज्र
को भी रखूँ गर हिसाब में
ता फिर न इंतिज़ार
में नींद आए उम्र भर
आने का अहद कर
गए आए जो ख़्वाब में
क़ासिद के आते
आते ख़त इक और लिख रखूँ
मैं जानता हूँ
जो वो लिखेंगे जवाब में
मुझ तक कब उन
की बज़्म में आता था दौर-ए-जाम
साक़ी ने कुछ
मिला न दिया हो शराब में
जो मुनकिर-ए-वफ़ा
हो फ़रेब उस पे क्या चले
क्यूँ बद-गुमाँ
हूँ दोस्त से दुश्मन के बाब में
मैं मुज़्तरिब
हूँ वस्ल में ख़ौफ़-ए-रक़ीब से
डाला है तुम को
वहम ने किस पेच-ओ-ताब में
मैं और हज़्ज़-ए-वस्ल
ख़ुदा-साज़ बात है
जाँ नज़्र देनी
भूल गया इज़्तिराब में
है तेवरी चढ़ी
हुई अंदर नक़ाब के
है इक शिकन पड़ी
हुई तरफ़-ए-नक़ाब में
लाखों लगाओ एक
चुराना निगाह का
लाखों बनाव एक
बिगड़ना इ'ताब में
वो नाला दिल में
ख़स के बराबर जगह न पाए
जिस नाला से शिगाफ़
पड़े आफ़्ताब में
वो सेहर मुद्दआ-तलबी
में न काम आए
जिस सेहर से सफ़ीना
रवाँ हो सराब में
'ग़ालिब' छुटी शराब पर अब भी कभी कभी
पीता हूँ रोज़-ए-अब्र
ओ शब-ए-माहताब में
दिल तो दिल वो दिमाग़ भी न रहा
वो फ़िराक़ और वो विसाल कहाँ
वो शब-ओ-रोज़ ओ माह-ओ-साल कहाँ
फ़ुर्सत-ए-कारोबार-ए-शौक़ किसे
ज़ौक़-ए-नज़्ज़ारा-ए-जमाल कहाँ
दिल तो दिल वो दिमाग़ भी न रहा
शोर-ए-सौदा-ए-ख़त्त-ओ-ख़ाल कहाँ
थी वो इक शख़्स के तसव्वुर से
अब वो रानाई-ए-ख़याल कहाँ
ऐसा आसाँ नहीं लहू रोना
दिल में ताक़त जिगर में हाल कहाँ
हम से छूटा क़िमार-ख़ाना-ए-इश्क़
वाँ जो जावें गिरह में माल कहाँ
फ़िक्र-ए-दुनिया में सर खपाता हूँ
मैं कहाँ और ये वबाल कहाँ
मुज़्महिल हो गए क़वा ग़ालिब
वो अनासिर में ए'तिदाल कहाँ
बोसे में वो मुज़ाइक़ा न करे
पर मुझे ताक़त-ए-सवाल कहाँ
फ़लक-ए-सिफ़्ला बे-मुहाबा है
इस सितम-गर को इंफ़िआल कहाँ
बिजली इक कौंद गई आँखों के आगे तो क्या
हुई ताख़ीर तो
कुछ बाइस-ए-ताख़ीर भी था
आप आते थे मगर
कोई इनाँ-गीर भी था
तुम से बेजा है
मुझे अपनी तबाही का गिला
उस में कुछ शाइब-ए-ख़ूबी-ए-तक़दीर
भी था
तू मुझे भूल गया
हो तो पता बतला दूँ
कभी फ़ितराक में
तेरे कोई नख़चीर भी था
क़ैद में है तिरे
वहशी को वही ज़ुल्फ़ की याद
हाँ कुछ इक रंज-ए-गिराँ-बारी-ए-ज़ंजीर
भी था
बिजली इक कौंद
गई आँखों के आगे तो क्या
बात करते कि मैं
लब-तिश्ना-ए-तक़रीर भी था
यूसुफ़ उस को
कहूँ और कुछ न कहे ख़ैर हुई
गर बिगड़ बैठे
तो मैं लाइक़-ए-ताज़ीर भी था
देख कर ग़ैर को
हो क्यूँ न कलेजा ठंडा
नाला करता था
वले तालिब-ए-तासीर भी था
पेशे में ऐब नहीं
रखिए न फ़रहाद को नाम
हम ही आशुफ़्ता-सरों
में वो जवाँ-मीर भी था
हम थे मरने को
खड़े पास न आया न सही
आख़िर उस शोख़
के तरकश में कोई तीर भी था
पकड़े जाते हैं
फ़रिश्तों के लिखे पर ना-हक़
आदमी कोई हमारा
दम-ए-तहरीर भी था
रेख़्ते के तुम्हीं
उस्ताद नहीं हो 'ग़ालिब'
कहते हैं अगले
ज़माने में कोई 'मीर' भी था
अपने जी में हम ने ठानी और है
कोई दिन गर ज़िंदगानी
और है
अपने जी में हम
ने ठानी और है
आतिश-ए-दोज़ख़
में ये गर्मी कहाँ
सोज़-ए-ग़म-हा-ए-निहानी
और है
बार-हा देखी हैं
उन की रंजिशें
पर कुछ अब के
सरगिरानी और है
दे के ख़त मुँह
देखता है नामा-बर
कुछ तो पैग़ाम-ए-ज़बानी
और है
क़ाता-ए-एमार
है अक्सर नुजूम
वो बला-ए-आसमानी
और है
हो चुकीं 'ग़ालिब' बलाएँ सब तमाम
एक मर्ग-ए-ना-गहानी
और है
दर्द की दवा पाई दर्द-ए-बे-दवा पाया
कहते हो न देंगे
हम दिल अगर पड़ा पाया
दिल कहाँ कि गुम
कीजे हम ने मुद्दआ' पाया
इश्क़ से तबीअ'त ने ज़ीस्त का मज़ा पाया
दर्द की दवा पाई
दर्द-ए-बे-दवा पाया
दोस्त-दार-ए-दुश्मन
है ए'तिमाद-ए-दिल मा'लूम
आह बे-असर देखी
नाला ना-रसा पाया
सादगी ओ पुरकारी
बे-ख़ुदी ओ हुश्यारी
हुस्न को तग़ाफ़ुल
में जुरअत-आज़मा पाया
ग़ुंचा फिर लगा
खिलने आज हम ने अपना दिल
ख़ूँ किया हुआ
देखा गुम किया हुआ पाया
हाल-ए-दिल नहीं
मा'लूम लेकिन इस क़दर या'नी
हम ने बार-हा
ढूँडा तुम ने बार-हा पाया
शोर-ए-पंद-ए-नासेह
ने ज़ख़्म पर नमक छिड़का
आप से कोई पूछे
तुम ने क्या मज़ा पाया
है कहाँ तमन्ना
का दूसरा क़दम या रब
हम ने दश्त-ए-इम्काँ
को एक नक़्श-ए-पा पाया
बे-दिमाग़-ए-ख़जलत
हूँ रश्क-ए-इम्तिहाँ ता-कै
एक बेकसी तुझ
को आलम-आश्ना पाया
ख़ाक-बाज़ी-ए-उम्मीद
कार-ख़ाना-ए-तिफ़्ली
यास को दो-आलम
से लब-ब-ख़ंदा वा पाया
क्यूँ न वहशत-ए-ग़ालिब
बाज-ख़्वाह-ए-तस्कीं हो
कुश्ता-ए-तग़ाफ़ुल
को ख़स्म-ए-ख़ूँ-बहा पाया
फ़िक्र-ए-नाला
में गोया हल्क़ा हूँ ज़े-सर-ता-पा
उज़्व उज़्व जूँ
ज़ंजीर यक-दिल-ए-सदा पाया
शब नज़ारा-परवर
था ख़्वाब में ख़याल उस का
सुब्ह मौजा-ए-गुल
को नक़्श-ए-बोरिया पाया
जिस क़दर जिगर
ख़ूँ हो कूचा दादन-ए-गुल है
ज़ख्म-ए-तेग़-ए-क़ातिल
को तुर्फ़ा दिल-कुशा पाया
है मकीं की पा-दारी
नाम-ए-साहिब-ए-ख़ाना
हम से तेरे कूचे
ने नक़्श-ए-मुद्दआ पाया
ने 'असद' जफ़ा-साइल ने सितम जुनूँ-माइल
तुझ को जिस क़दर
ढूँडा उल्फ़त-आज़मा पाया
To be continued ...
